हिरोइन को मारो, कंट्रोल करो और ‘Alpha Male’ बन जाओ

साक्षी चतुर्वेदी
साक्षी चतुर्वेदी

एक दौर था जब हिंदी फिल्मों में हीरो विलेन को पीटकर अपनी मर्दानगी साबित करता था। अब नया ट्रेंड सामने है—हिरोइन को मारो, कंट्रोल करो और ‘Alpha Male’ बन जाओ। ग़ज़ब है भाई! इसे सिनेमा का विकास कहें या सोच का पतन?

Kabir Singh, Animal और ऐसी ही कई फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड तोड़े, लेकिन सवाल ये है—समाज को क्या दिया?

Cinema: आइना या इंफ्लुएंसर?

कभी कहा जाता था—Cinema is the mirror of सोसाइटी। आज हालात उलटे हैं। अब सिनेमा आइना नहीं, mould बन चुका है—जो सोच को आकार देता है।

जहाँ पहले गुस्सा विलेन पर निकलता था, अब वही गुस्सा प्यार के नाम पर महिला पात्रों पर उतारा जा रहा है। Dialogues clap-worthy हैं, scenes viral हैं, लेकिन message… questionable.

Toxic Masculinity का नया पोस्टर बॉय

इन फिल्मों में हीरो Aggressive है, Emotionally unavailable है, Women को “property” समझता है, Accountability?  और फिर उसे stylish background music के साथ celebrate किया जाता है।

समाज पर असर: Reel से Real तक

युवा दर्शक इन किरदारों को role model मानने लगते हैं। Problem ये नहीं कि सिनेमा dark है—problem ये है कि dark को glorify किया जा रहा है। जब हिंसा को “passion” और कंट्रोल को “love” कहा जाए, तो समाज में boundaries धुंधली होने लगती हैं।

पहले फिल्मों का message होता था— “बुराई पर अच्छाई की जीत” अब लगता है— “जो ज़्यादा toxic, वही ज़्यादा iconic” वाह रे modern cinema!

Audience भी जिम्मेदार?

सिर्फ filmmakers को दोष देना आसान है। लेकिन टिकट खरीदने वाली audience, viral reels, fan edits—सब मिलकर इस culture को fuel करते हैं।

Demand है, तभी supply है। सवाल ये है—हम क्या देखना चाहते हैं?

Re-think का समय

सिनेमा को preachy होना जरूरी नहीं, लेकिन responsible होना जरूरी है। Strong characters दिखाइए, complex emotions दिखाइए—पर हिंसा को heroism का shortcut मत बनाइए। Bollywood ko thoda “pause” aur society ko thoda “sense” chahiye.

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